सात दिन की देवयात्रा के बाद पशमी पहुंचे चालदा महासू महाराज, नव-निर्मित मंदिर में हुए विराजमान

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सात दिन की देवयात्रा के बाद पशमी पहुंचे चालदा महासू महाराज, नव-निर्मित मंदिर में हुए विराजमान

उत्तराखंड से हिमाचल प्रदेश के जिला सिरमौर तक विभिन्न पड़ावों से गुजरते हुए लगभग 70 किलोमीटर लंबी चालदा महासू महाराज की पैदल देवयात्रा सात दिन बाद पशमी गांव पहुंच गई। हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में चालदा महासू महाराज शान से नवनिर्मित पशमी मंदिर में विराजमान हुए। देवता के स्वागत को लेकर पूरे क्षेत्र में आस्था और उत्साह का वातावरण रहा।

देवयात्रा का शुभारंभ दिसंबर माह में उत्तराखंड के जौनसार क्षेत्र स्थित दसऊ गांव से हुआ था। यात्रा के दौरान हजारों श्रद्धालु देवता के साथ चले। कोई नंगे पांव, कोई निशान उठाए तो कोई ढोल-नगाड़ों की थाप पर जयकारे लगाते हुए देवयात्रा में सहभागी बना। यह पहला अवसर रहा जब छत्रधारी चालदा महासू महाराज उत्तराखंड की धरती से निकलकर गिरिपार क्षेत्र में प्रवेश किए।

13 दिसंबर को जब देवयात्रा ने मीनस पुल पार किया, तो यह केवल भौगोलिक सीमा का नहीं बल्कि उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की साझा आस्था का प्रतीक बन गया। उसी रात देवता ने द्राबिल गांव में विश्राम किया, जहां ग्रामीणों ने दीप प्रज्वलन और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ भव्य स्वागत किया। अगले दिन देवयात्रा पशमी गांव के लिए रवाना हुई।

14 दिसंबर को देवयात्रा के शिलाई पहुंचने पर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। अनुमान के अनुसार यहां पचास हजार से अधिक श्रद्धालु देव दर्शन के लिए उपस्थित रहे। रात्रि लगभग 3:20 बजे देवयात्रा का अंतिम पड़ाव पशमी गांव बना, जहां पहले से ही व्यापक तैयारियां की गई थीं। रास्तों की सफाई, घर-आंगनों की सजावट और स्वागत की विशेष व्यवस्थाएं की गई थीं।

पशमी गांव में लगभग दो करोड़ रुपये की लागत से मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया है। ध्वजा प्रतिष्ठा पहले ही संपन्न हो चुकी थी और सोमवार को विधिवत अनुष्ठानों के साथ चालदा महासू महाराज अपने नव-जीर्णोद्धारित मंदिर में विराजमान हुए। देवता के आगमन के साथ ही सेवा, भंडारे और दान की परंपरा जीवंत हो उठी। मंदिर समिति की ओर से लगातार भंडारों का आयोजन किया जा रहा है। प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु राशन, घी, दाल व अन्य सामग्री स्वेच्छा से दान करने पहुंचे।

ग्रामीणों का कहना है कि यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामूहिक सहभागिता और सामाजिक एकता का प्रतीक है। लोक मान्यता के अनुसार पशमी गांव में महासू महाराज की स्थापना 700 से 900 वर्ष पूर्व हुई थी। माना जाता है कि देवता का चालित स्वरूप हनोल धाम से निकलकर देव-वाणी के माध्यम से विभिन्न गांवों की यात्रा करता हुआ पशमी पहुंचा, जहां विधिवत अनुष्ठान के बाद महासू महाराज पशमी के प्रधान ग्राम देव के रूप में स्थापित हुए।